रंगों की विदाई, नववर्ष की अगवानी: होली से होता है हिंदू संवत्सर का समापन
विपिन सिंह ब्यूरो चीफ महराजगंज

भारत रक्षक न्यूज
महराजगंज,भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक होते हैं। हिंदू परंपराओं के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली वर्ष का अंतिम प्रमुख त्यौहार माना जाता है। इसके साथ ही एक संवत्सर का समापन और नए वर्ष के स्वागत की तैयारी आरंभ हो जाती है।
होली का पर्व दो दिनों तक उल्लास और आस्था के साथ मनाया जाता है। पहले दिन होलिका दहन के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है, जबकि दूसरे दिन रंगों की होली खेलकर लोग आपसी मनमुटाव भुलाकर प्रेम और सौहार्द का परिचय देते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और दैत्यराज हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के दहन की कथा से जुड़ा है, जो यह सिखाता है कि सत्य और भक्ति की शक्ति अंततः विजयी होती है।
धार्मिक मान्यता है कि होली के बाद चैत्र मास का आगमन होता है, जिससे हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत का नया वर्ष प्रारंभ होता है। इस दृष्टि से होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि एक वर्ष की विदाई और नवसंवत्सर के स्वागत का प्रतीक है।
ग्रामीण अंचलों में होली का विशेष महत्व देखने को मिलता है। गांवों में फाग, चौताल और पारंपरिक गीतों के माध्यम से लोक संस्कृति जीवंत हो उठती है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि होली सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करने वाला पर्व है। यह त्योहार भेदभाव की दीवारों को तोड़कर प्रेम, सहयोग और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
इस प्रकार, होली केवल रंगों की मस्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदू परंपराओं में वर्ष के समापन का सांस्कृतिक प्रतीक और नए उत्साह के साथ जीवन की नई शुरुआत का संदेशवाहक भी है।



